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Delimitation Issue in Recent Times in India
भारत में परिसीमन का मुद्दा: हाल के समय में क्यों बढ़ी चर्चा?
भारत में परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा हाल के समय में एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय बहस बन गया है। खासकर जनगणना 2027 और लोकसभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर होने वाली संभावित पुनर्संरचना ने इस विषय को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
परिसीमन का संबंध केवल चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं तय करने से नहीं है, बल्कि यह जनसंख्या, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संघवाद और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन से भी जुड़ा हुआ है।
परिसीमन क्या है?
परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों का पुनर्निर्धारण।
इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अलग-अलग क्षेत्रों की जनसंख्या के अनुसार उन्हें उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले।
भारत में परिसीमन का काम परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) द्वारा किया जाता है। हालांकि, अलग-अलग समय पर राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के वितरण को कुछ समय के लिए स्थिर रखा गया है।
भारत में वर्तमान लोकसभा सीटों का राज्यवार वितरण मुख्य रूप से 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है। इसी कारण आगामी जनगणना के बाद होने वाला संभावित परिसीमन एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
अभी परिसीमन की चर्चा क्यों हो रही है?
इस मुद्दे की चर्चा का सबसे बड़ा कारण जनगणना 2027 है।
नई जनसंख्या के आंकड़े सामने आने के बाद यह सवाल उठेगा कि क्या लोकसभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व को वर्तमान जनसंख्या के आधार पर पुनर्गठित किया जाना चाहिए।
यहीं से राजनीतिक और संघीय बहस शुरू होती है।
यदि जनसंख्या को सीटों के पुनर्वितरण का मुख्य आधार बनाया जाता है, तो अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को लोकसभा में अधिक सीटें मिल सकती हैं।
दक्षिणी राज्यों की चिंता क्या है?
तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों ने लंबे समय से जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में बेहतर प्रदर्शन किया है।
इन राज्यों की चिंता यह है कि यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का वितरण पूरी तरह वर्तमान जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो अपेक्षाकृत अधिक जनसंख्या वाले उत्तर और मध्य भारत के राज्यों की सीटों में बड़ी वृद्धि हो सकती है।
इससे दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि उनकी सापेक्ष राजनीतिक शक्ति और संसद में प्रभाव कम हो सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन किया, क्या उन्हें इसका राजनीतिक नुकसान उठाना चाहिए?
परिसीमन और संघवाद का संबंध
परिसीमन केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने की प्रक्रिया नहीं है। इसका सीधा प्रभाव भारत के संघीय ढांचे पर भी पड़ सकता है।
किसी राज्य को लोकसभा में अधिक सीटें मिलने का अर्थ है कि राष्ट्रीय स्तर पर उस राज्य का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संभावित प्रभाव बढ़ सकता है।
दूसरी ओर, जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व लोकतंत्र के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत “एक व्यक्ति, एक वोट” से जुड़ा हुआ है।
इसलिए भारत के सामने दो महत्वपूर्ण उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है:
- जनसंख्या के आधार पर समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व
- जनसंख्या नियंत्रण में राज्यों के योगदान को ध्यान में रखना
आगे का रास्ता क्या हो सकता है?
परिसीमन की प्रक्रिया पारदर्शी, संवैधानिक और सभी राज्यों के लिए स्वीकार्य होनी चाहिए।
इस विषय पर केंद्र और राज्यों के बीच व्यापक राजनीतिक संवाद आवश्यक होगा। साथ ही, यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि प्रत्येक नागरिक को उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले और उन राज्यों में यह भावना पैदा न हो कि जनसंख्या नियंत्रण की सफलता के कारण उन्हें राजनीतिक रूप से नुकसान हो रहा है।
भारत में परिसीमन की बहस वास्तव में लोकतंत्र, प्रतिनिधित्व, जनसंख्या नीति और सहकारी संघवाद से जुड़ी एक बड़ी बहस है।
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एक aspirant को परिसीमन को केवल राजनीतिक विवाद के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसके संवैधानिक प्रावधान, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, जनसंख्या परिवर्तन, राज्यों की चिंताओं और संभावित राजनीतिक प्रभाव को संतुलित दृष्टिकोण से समझना चाहिए।
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